दुनिया भर के शेयर बाज़ारों में रात को तेज़ गिरावट देखी गई। यह गिरावट अमेरिका से शुरू होकर एशिया के बाज़ारों तक फैल गई।
बिज़नेस टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार सुबह सेंसेक्स और निफ्टी के नीचे खुलने की संभावना है।
GIFT निफ्टी फ्यूचर्स 168.50 अंक, यानी 0.68 प्रतिशत गिरकर 22,775 पर था।
एक नज़र में
- अमेरिकी शेयरों में अप्रैल 2025 की टैरिफ वाली गिरावट के बाद का सबसे बड़ा नुकसान बताया गया।
- दक्षिण कोरिया का कोस्पी 8 प्रतिशत से ज़्यादा गिरा और सर्किट ब्रेकर लगा।
- जापान का निक्केई 225 करीब 6 प्रतिशत टूटा।
- ब्रेंट क्रूड तेल फिर लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल की ओर बढ़ा।
वॉल स्ट्रीट पर गिरावट कितनी बड़ी थी?
नैसडैक कंपोज़िट 5.52 प्रतिशत गिरा, जिससे करीब एक ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ।
S&P 500 4.35 प्रतिशत और डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 3.44 प्रतिशत नीचे आया।
%
ग्राफिक: News Anek, इसी खबर के तथ्यों से
द हिंदू बिज़नेसलाइन ने नैसडैक में 6.4 प्रतिशत गिरावट बताई। उसके मुताबिक डाउ 1,833 अंक टूटा और इसे 2020 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट कहा गया।
दोनों रिपोर्टों में गिरावट के पैमाने पर अंतर है।
CBOE वोलेटिलिटी इंडेक्स (VIX), जिसे निवेशकों की बेचैनी का संकेतक माना जाता है, करीब 70 प्रतिशत उछला। इससे घबराहट का अंदाज़ा मिलता है।
एशिया के बाज़ार भी क्यों गिरे?
यह गिरावट एशिया तक फैली और टेक्नोलॉजी व सेमीकंडक्टर कंपनियों पर भारी दबाव रहा।
निवेशकों को डर है कि अमेरिका में AI पर सख्त नियम आगे की वृद्धि को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
इसके अलावा AI के बुनियादी ढांचे पर खर्च धीमा पड़ने की आशंका भी है। इन चिंताओं का सबसे ज़्यादा असर चिप बनाने वाली कंपनियों पर दिखा।
भारत पर इसका क्या असर होगा?
तो यह भारतीय निवेशकों के लिए क्यों ज़रूरी है? निवेशक सतर्क रहने की संभावना है।
वे वैश्विक टेक शेयरों, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के प्रवाह और कच्चे तेल के दामों पर नज़र रखेंगे।
कच्चे तेल का असर भी अहम है। ब्रेंट के 100 डॉलर प्रति बैरल की ओर बढ़ने से महंगाई की चिंता फिर उभरी है।
इससे भारत के आयात बिल और कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है।
रात की गिरावट के बाद अमेरिकी इक्विटी फ्यूचर्स में सुधार से कुछ राहत मिली।
यह सुधार कितना टिकेगा, यह अभी साफ़ नहीं है, और अस्थिरता ऊँची रहने की संभावना है।
समझिए
पहले क्या हुआ
- अमेरिकी शेयरों में अप्रैल 2025 के टैरिफ से जुड़ी गिरावट के बाद का सबसे बड़ा नुकसान दर्ज हुआ, बिज़नेस टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक।
- ब्रेंट क्रूड तेल लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल की ओर लौटा, जिससे भारत के आयात बिल और कंपनियों के मुनाफे को लेकर महंगाई की चिंता फिर उभरी।
- निवेशकों को डर है कि अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर सख्त नियम और AI के बुनियादी ढांचे पर धीमा खर्च आगे की वृद्धि को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
यह क्यों अहम है
भारतीय निवेशक वैश्विक टेक शेयरों, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के प्रवाह और कच्चे तेल के दामों पर नज़र रख रहे हैं। कच्चा तेल आयात बिल और कंपनियों के मुनाफे को भी प्रभावित करता है।
आगे क्या
- निवेशक देखेंगे कि अमेरिकी बाज़ार में सुधार ज़ोर पकड़ता है या नहीं, क्योंकि अस्थिरता ऊँची रहने की संभावना है।