कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मंगलवार को महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट में एक हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के लिए पेड़ों की कथित कटाई पर सवाल उठाए। उन्होंने इसे देश के लोगों पर थोपी जा रही "पारिस्थितिक तबाही" का एक और उदाहरण बताया। The New Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने यह बात सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखी।
एक नज़र में
- एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पंप्ड-स्टोरेज प्रोजेक्ट के लिए करीब 1,100 पेड़ काटे जा चुके हैं।
- रिपोर्ट में कहा गया है कि 32,000 से ज़्यादा पेड़ हटाने के लिए चिह्नित किए गए हैं।
- प्रोजेक्ट की लागत 13,505 करोड़ रुपये बताई गई है और यह रायगढ़ जिले के कर्जत में है।
- विपक्ष और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने महायुति सरकार की आलोचना की है।
जयराम रमेश ने क्या कहा
कांग्रेस के महासचिव (संचार प्रभारी) और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने X पर एक मीडिया रिपोर्ट साझा की। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पश्चिमी घाट में बन रहे पंप्ड-स्टोरेज हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के लिए करीब 1,100 पेड़ काटे जा चुके हैं। इस प्रोजेक्ट को लेकर वन अधिकारों, आदिवासियों की आजीविका और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की चिंताएं सामने आई हैं।
रमेश ने पोस्ट में सवाल किया कि इसका फायदा किसे मिल रहा है और नुकसान किसे उठाना पड़ रहा है।
संजय राउत के आरोप
रमेश की यह टिप्पणी शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत के आरोपों के कुछ दिन बाद आई है। राउत ने आरोप लगाया था कि वन विभाग को भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य के पास, जो पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है, 32,000 से अधिक पेड़ काटने का आदेश दिया गया है। उनका दावा है कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले महीने होने वाले दौरे से पहले किया जा रहा है, जब वे प्रोजेक्ट का शिलान्यास करेंगे।
राउत ने X पर एक मंज़ूरी पत्र भी साझा किया, जो कथित तौर पर एक वन अधिकारी ने जारी किया था। इसमें रायगढ़ जिले के कर्जत में सैदोंगर-I पंप्ड स्टोरेज हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के लिए 233 हेक्टेयर ज़मीन के डायवर्जन की अनुमति दी गई है।
क्यों अहम है यह मामला
पश्चिमी घाट पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील इलाका माना जाता है। ऐसे में इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई को लेकर विपक्ष और पर्यावरण कार्यकर्ता सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने महायुति सरकार पर जंगलों और वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया है। स्रोत में सरकार की ओर से इन आरोपों पर किसी जवाब का ज़िक्र नहीं है। आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री के प्रस्तावित दौरे और शिलान्यास कार्यक्रम पर इस विवाद का असर देखने को मिल सकता है।