ऋचा बाजपेई अभी इंजीनियरिंग की छात्रा थीं, जब उन्होंने अपनी पहली कंपनी शुरू करने का फैसला किया। उनके सामने कोई तय करियर रास्ता नहीं था।
अनुभव भी कम था, और यह भी पक्का नहीं था कि काम चलेगा।
उसके बाद उनका सफर भी पारंपरिक नहीं रहा। आज वे कैंपस फंड की संस्थापक और सीईओ हैं, जो युवा उद्यमियों में निवेश करने वाला वेंचर कैपिटल मंच है।
एक नज़र में
- इंजीनियरिंग के आखिरी साल में उन्होंने नेक्स्टजेन शुरू की।
- उन्होंने गुडेरा की सह-स्थापना की, जो कॉर्पोरेट सामाजिक प्रभाव और स्वयंसेवा पर काम करती है।
- निवेश की दुनिया में आने से पहले उन्होंने लंदन बिज़नेस स्कूल से एमबीए किया।
- कैंपस फंड छात्र उद्यमियों, नए ग्रेजुएट्स और पढ़ाई छोड़ चुके लोगों का साथ देता है।
तो यह सफर शुरू कहां से हुआ?
इंजीनियरिंग कॉलेज में रहते हुए ऋचा ने नेक्स्टजेन शुरू की। यह एक छोटी शुरुआत थी, जिसका भविष्य अनिश्चित था।
वे काम करते हुए सीख रही थीं, और उनके पास कोई सुरक्षा कवच नहीं था।
अपना कुछ बनाने का वह शुरुआती फैसला आगे चलकर उनकी सोच का आधार बना। बाद में इसी सोच से उन्होंने दूसरे संस्थापकों को परखना सीखा।
शुरुआती सालों में मुश्किल क्या थी?

छात्र रहते हुए कंपनी चलाना पढ़ाई, पैसे और संदेह के बीच संतुलन बनाने जैसा है।
लेकिन इतना साफ है कि उनके रास्ते का कोई बना-बनाया नक्शा नहीं था।
आने वाले सालों में भी उनका काम बनाने और सलाह देने के बीच चलता रहा। हर कदम ने युवा संस्थापकों की चुनौतियों की नई समझ दी।
उनके करियर में मोड़ कब आया?

मोड़ तब आया जब वे कंपनियां बनाने से निवेश करने की ओर बढ़ीं। उन्होंने ब्रिटेन और यूरोप में एक निवेश समिति में काम किया।
कैंपस फंड शुरू करने से पहले उन्होंने लंदन की एक निजी इक्विटी फर्म को सलाह भी दी।
- 1नेक्स्टजेन की शुरुआतइंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ते हुए छोटी शुरुआत, जिसका भविष्य अनिश्चित था।
- 2कंपनियों से निवेश की ओरमोड़ तब आया जब वे निवेश की ओर बढ़ीं और ब्रिटेन व यूरोप में निवेश समिति में काम किया।
- 3लंदन की निजी इक्विटी फर्म को सलाहकैंपस फंड शुरू करने से पहले लंदन की एक निजी इक्विटी फर्म को सलाह दी।
- 4कैंपस फंड की स्थापनाआज वे युवा उद्यमियों में निवेश करने वाले इस वेंचर कैपिटल मंच की संस्थापक और सीईओ हैं।
ग्राफिक: News Anek, इसी खबर के तथ्यों से
अब वे मेज़ के दूसरी ओर बैठती हैं। वे उन युवा उद्यमियों से मिलती हैं जो उसी दौर में हैं जिसमें वे कभी थीं।
आज वे कहां हैं, और वे क्या मानती हैं?

ऋचा का मानना है कि उद्यमी की संभावना लगन, लचीलेपन, जोखिम उठाने की क्षमता और परंपरा को चुनौती देने की इच्छा से बेहतर परखी जाती है।
अकेली शैक्षणिक डिग्री पूरी तस्वीर नहीं बताती।
वे यह भी कहती हैं कि भारत के वेंचर कैपिटल नेतृत्व में महिलाएं अब भी कम हैं।
उनका अपना रास्ता याद दिलाता है कि सार्थक काम तक पहुंचने के कई तरीके होते हैं।
यह कहानी सबसे पहले आउटलुक इंडिया ने बताई।
कहानी बिज़नेस की
इस सफ़र से 3 सीख
- पढ़ाई के दौरान छोटी शुरुआत करें, क्योंकि असली काम से अनुभव जल्दी मिलता है।
- करियर में धैर्य रखें, बनाने और निवेश करने के बीच आते-जाते हुए सीखते रहें।
- किसी व्यक्ति को परखते समय डिग्री की जगह लगन, धैर्य और नया सोचने की हिम्मत देखें।