गुजरात विधानसभा ने राज्य के 1947 के भूमि विखंडन कानून, यानी तुकड़ा धारा, में बदलाव को सर्वसम्मति से पास कर दिया है। Swarajya की रिपोर्ट के मुताबिक अब 1948 से मार्च 2026 के बीच इस कानून के खिलाफ हुई खेती की ज़मीन की हर बिक्री या बंटवारा वैध माना जाएगा। इसके लिए मालिकों को कोई पैसा नहीं देना होगा।
एक नज़र में
- 1948 से मार्च 2026 तक की ऐसी सभी खरीद-बिक्री और बंटवारे अब वैध हैं।
- मालिकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा और ऐसे सभी लंबित मामले बंद कर दिए गए हैं।
- पूरे राज्य के लिए न्यूनतम प्लॉट का एक ही आकार तय किया गया है।
- शहरों को इस कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया है।
छोटे होते खेत और पुराने कानून
रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर पीढ़ी के साथ खेत छोटे होते गए हैं। चार एकड़ वाले किसान के दो बेटे हों तो हर एक को दो एकड़ मिलते हैं। अगली पीढ़ी में यही हिस्सा एक एकड़ रह जाता है। 1970-71 की पहली कृषि जनगणना में करीब 7 करोड़ खेत थे। 2015-16 तक यह संख्या बढ़कर 14.6 करोड़ से ज़्यादा हो गई, और औसत खेत सिर्फ़ 1.08 हेक्टेयर का रह गया।
आज़ादी के बाद पंजाब, राजस्थान, बिहार, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा और पुराने बॉम्बे राज्य जैसे कई राज्यों ने न्यूनतम आकार से छोटी ज़मीन के बंटवारे और बिक्री पर रोक लगाई। सोच यह थी कि बहुत छोटा खेत परिवार का पेट नहीं भर सकता। फिर भी परिवार ज़मीन बांटते रहे और किसान पैसों की ज़रूरत पर छोटे टुकड़े बेचते रहे। कानून ने इन सौदों को केवल कागज़ पर अवैध बनाया।
नतीजा यह हुआ कि लाखों खरीदारों के पास ऐसी ज़मीन रह गई जिसे राजस्व विभाग अपना मानने को तैयार नहीं था। वे उसे साफ तरीके से बेच नहीं सकते थे, उस पर कर्ज़ नहीं ले सकते थे और मकान भी नहीं बना सकते थे।
एक खरीदार का मामला
रिपोर्ट में नर्मदा ज़िले के देवांश पटेल का उदाहरण दिया गया है। उन्होंने 2012 में खेती की ज़मीन खरीदी, रजिस्ट्री कराई और विक्रेता को पूरा भुगतान किया। दो साल बाद ज़िले के राजस्व अधिकारियों ने इस सौदे को तुकड़ा धारा के तहत अवैध बता दिया। 2018 में राज्य राजस्व विभाग में उनकी अपील खारिज हो गई, तो वे गुजरात हाई कोर्ट पहुंचे।
सुनवाई तक नया कानून लागू हो चुका था। सरकार ने फिर भी मामला राजस्व अधिकारियों को लौटाने की मांग की, पर कोर्ट ने इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पटेल ने ईमानदारी से ज़मीन खरीदी थी, विक्रेताओं ने पैसे रख लिए थे और उन्हें सालों तक दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े। मामला उनके पक्ष में बंद हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में हज़ारों खरीदारों की ऐसी ही फाइलें थीं।
दूसरे राज्यों के लिए क्या सबक
Swarajya के अनुसार माफ़ी को मुफ़्त रखना सही फ़ैसला है। महाराष्ट्र में भी यही 1947 वाला कानून है। वहां पहले ज़मीन के बाज़ार मूल्य का एक चौथाई तक शुल्क लगाकर सौदे वैध करने को कहा गया। मालिक आगे नहीं आए तो शुल्क घटाकर 5 प्रतिशत किया गया। फिर भी कई लोग दूर रहे, और 2025 में इसे मुफ़्त कर दिया गया, लेकिन सिर्फ़ शहरों और उनके आसपास की ज़मीन के लिए।
गुजरात का कानून इससे आगे जाता है। यह स्थानीय नियमों के उलझे जाल की जगह पूरे राज्य के लिए एक सरल न्यूनतम प्लॉट आकार तय करता है। साथ ही खेती के लिए बने कानून से शहरों को बाहर रखता है।
रिपोर्ट का सुझाव है कि अगला सुधार छोटे मालिकों को सुरक्षित तरीके से ज़मीन पट्टे पर देने की सुविधा देना हो सकता है। इससे परिवार का मालिकाना हक बना रहेगा और खेती बड़े हिस्सों में हो सकेगी।