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कहानी बिज़नेस की

मुंबई के एविएशन अनुभवी ने 88 नाकाम कोशिशों के बाद खाने वाले चम्मच बनाए

रूपेश के॰ संघवी ने 2022 में एडीबाइट्स शुरू किया। उनके चम्मच बाजरे और आटे से बने हैं, जिन्हें खाया जा सकता है या खाद बनने दिया जा सकता है। कई प्रोटोटाइप नाकाम होने के बाद अब ये चम्मच आयोजनों तक पहुंच रहे हैं।

A small Mumbai kitchen at dusk, flour sacks and millet grains on a steel counter, a pot steaming on a gas stove, a figure seen from behind.
AI चित्रण

मुंबई में एक गणपति समारोह में खाना खत्म हो चुका था और सब मिठाई का इंतज़ार कर रहे थे।

मेज़बान ने मेहमानों से कहा कि चम्मच फेंके नहीं, बल्कि संभालकर रखें।

ये चम्मच एडीबाइट्स नाम के मुंबई के स्टार्टअप ने बनाए हैं। विचार सीधा है।

इस चम्मच को खाया जा सकता है, और कोई न खाए तो यह अपने आप गल कर मिट्टी में मिल जाता है।

एक नज़र में

  • एडीबाइट्स की शुरुआत 2022 में रूपेश के॰ संघवी ने की, जिनके पास 17 से ज़्यादा साल का एविएशन और यात्रा क्षेत्र का अनुभव है।
  • चम्मच बाजरे और आटे के मिश्रण से बने हैं और न खाए जाने पर अपने आप टूटने के लिए बनाए गए हैं।
  • यह विचार कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान आया, जब घर में साफ़ चम्मच ढूंढना मुश्किल हो गया था।
  • 88 नाकाम प्रोटोटाइप के बाद अब यह उत्पाद आयोजनों, समारोहों और संस्थागत भोजन सेवाओं में इस्तेमाल होने लगा है।

तो शुरुआत कहां से हुई?

यह विचार कोविड-19 लॉकडाउन में घर से शुरू हुआ। सेवाएं कम थीं, इसलिए रोज़ के काम घर के लोगों पर आ गए।

एक दिन खाना बनाने के बाद बर्तनों से भरा सिंक देखकर संघवी हाथ से खाने लगे। कोई साफ़ चम्मच बचा ही नहीं था।

उन्होंने सोचा कि क्या खिचड़ी का आख़िरी निवाला ऐसे चम्मच से खाया जा सकता है जो खाखरा जैसी चीज़ से बना हो। यह सवाल उनके मन में बना रहा।

पर खाने लायक चम्मच बनाना कितना मुश्किल था?

A cluttered workbench with trays of rough, broken test spoons and a stack of notebooks, a single bulb casting warm light, nobody's face visible.
AI चित्रण

चम्मच को पूरे भोजन तक खाना उठाने लायक मज़बूत होना था। उसका स्वाद भी अच्छा होना था और कीमत लोगों के लिए सही रहनी थी।

एविएशन और यात्रा उद्योग में बिक्री और कारोबार विकास के अपने वर्षों में संघवी ने देखा था कि कितना डिस्पोज़ेबल सामान रोज़ इस्तेमाल होता है।

इसी अनुभव ने उन्हें बेहतर हल खोजने के लिए प्रेरित किया।

88 प्रोटोटाइप नाकाम होने के बाद बाजरे और आटे का चम्मच सही लगा। हर नाकामी ने बनावट, मज़बूती और स्वाद के बारे में कुछ सिखाया।

जब चम्मच असली लोगों तक पहुंचे तो क्या बदला?

A busy Indian event hall with long tables set for guests, bowls of kheer and small spoons laid out, people seen at a distance from the side.
AI चित्रण

असली मोड़ तब आया जब चम्मच असली जगहों पर इस्तेमाल हुए। गणपति समारोह में बच्चे उन्हें कुरकुरे नाश्ते की तरह खाने लगे।

बड़े पहले सावधान थे और देख रहे थे कि चम्मच सचमुच काम करता है या नहीं। फिर कुछ और लोग भी चखने की इच्छा करने लगे।

एडीबाइट्स को आयोजनों, समारोहों और संस्थागत भोजन सेवाओं में शुरुआती पहचान मिलने लगी।

हर छोटे इस्तेमाल ने दिखाया कि यह विचार प्रयोगशाला के बाहर भी चल सकता है।

आज एडीबाइट्स कहां खड़ा है?

A neat production unit with racks of drying edible spoons in rows, soft daylight from a high window, a worker's hands only, seen from behind.
AI चित्रण

आज एडीबाइट्स एक बहुत आम समस्या हल करने की कोशिश कर रहा है। कुछ मिनट इस्तेमाल होने के बाद डिस्पोज़ेबल चम्मच का क्या होता है?

कंपनी अभी शुरुआती चरण में है और एक-एक आयोजन और एक-एक भोजन के ज़रिए लोगों तक पहुंच रही है।

संघवी की कहानी दिखाती है कि घर में उठा एक सरल सवाल कारोबार में कैसे बदल सकता है।

यह कहानी सबसे पहले The Better India ने बताई।

कहानी बिज़नेस की

इस सफ़र से 3 सीख

  1. रोज़मर्रा की छोटी परेशानियों पर ध्यान दें, क्योंकि वहीं से असली विचार निकल सकते हैं
  2. नाकामी को सीख मानें और हर प्रोटोटाइप से कुछ नया समझें
  3. बड़े स्तर पर जाने से पहले असली लोगों और असली जगहों पर उत्पाद को परखें

स्रोत

कहानी बिज़नेस कीस्टार्टअप

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