श्रीधर वेम्बू बड़ी तकनीकी कंपनियों की दुनिया से बहुत दूर एक गांव में पले-बढ़े।
उनका जन्म 1968 में तमिलनाडु के तंजावुर जिले के उमयालपुरम गांव में हुआ था। बाद में उनका परिवार चेन्नई चला गया, जहां उन्होंने स्कूल पूरा किया।
उनकी कहानी पढ़ाई, दूरी और आखिर में वापसी की है। आज वे ज़ोहो कॉर्पोरेशन के सह-संस्थापक के रूप में जाने जाते हैं।
पर इस नाम तक पहुंचने का रास्ता कक्षाओं, शोध प्रयोगशालाओं और दुनिया के दूसरे छोर की एक नौकरी से होकर गुजरा।
एक नज़र में
- 1968 में तमिलनाडु के तंजावुर जिले के एक गांव में जन्म।
- 1989 में आईआईटी मद्रास से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक।
- प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से मास्टर्स और पीएचडी, जो 1994 में पूरी हुई।
- 1996 में एडवेंटनेट की स्थापना, जो बाद में ज़ोहो कॉर्पोरेशन बनी।
तो शुरुआत कहां से हुई?

वेम्बू ने वेस्ट मांबलम के अंजुगम हायर सेकेंडरी स्कूल में कक्षा 9 तक पढ़ाई की।
फिर वे ईस्ट ताम्बरम के जयगोपाल गरोदिया नेशनल हायर सेकेंडरी स्कूल चले गए। उन्होंने 1985 में स्कूल पूरा किया।
इसके बाद उन्होंने आईआईटी मद्रास में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग पढ़ी। 1989 में वे स्नातक हुए। उस डिग्री ने आगे के सफ़र की नींव रखी।

इस रास्ते का सबसे कठिन हिस्सा क्या था?

सबसे कठिन हिस्सा दूरी था। गांव और फिर शहर से आए एक छात्र को दूसरे देश में उन्नत शोध तक पहुंचना था।
इसका मतलब था घर छोड़ना और दूर एक नई ज़िंदगी बनाना।
आईआईटी मद्रास के बाद वे न्यू जर्सी की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी गए। वहां उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में मास्टर्स और फिर पीएचडी की।
पीएचडी उन्होंने 1994 में पूरी की। उनका शोध सूचना सिद्धांत और संचार पर केंद्रित था।
उनके जीवन का मोड़ कौन सा था?

मोड़ उनकी पहली नौकरी से आया। 1994 में वे कैलिफ़ोर्निया के सैन डिएगो में क्वालकॉम से जुड़े।
वहां वे वायरलेस संचार इंजीनियर और सिस्टम डिज़ाइन इंजीनियर के रूप में काम करते थे।
उनका काम कोड डिविज़न मल्टीपल एक्सेस से जुड़ा था, जो वायरलेस संचार प्रणालियों में इस्तेमाल होती है।
वे 1996 तक क्वालकॉम में रहे। उसी साल उन्होंने और उनके सहयोगियों ने एडवेंटनेट की स्थापना की, जो बाद में ज़ोहो कॉर्पोरेशन बनी।
- 1968तमिलनाडु के तंजावुर जिले के उमयालपुरम गांव में जन्म हुआ
- 1985ईस्ट ताम्बरम के जयगोपाल गरोदिया नेशनल हायर सेकेंडरी स्कूल से पढ़ाई पूरी की
- 1989आईआईटी मद्रास से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक हुए
- 1994प्रिंसटन में पीएचडी पूरी की और सैन डिएगो में क्वालकॉम से जुड़े
- 1996सहयोगियों के साथ एडवेंटनेट की स्थापना की, जो बाद में ज़ोहो बनी
ग्राफिक: News Anek, इसी खबर के तथ्यों से
जो इंजीनियर सिस्टम बनाना सीख चुका था, अब उसने एक कंपनी बनाना शुरू किया।
आज वे कहां हैं, और अब क्या चाहते हैं?

वेम्बू का अपना सफ़र विदेश में उच्च शिक्षा और तकनीकी नौकरी से शुरू हुआ। बाद में वे भारत लौटे और यहां एक सॉफ्टवेयर व्यवसाय खड़ा किया।
यही रास्ता अब उनके संदेश को आकार देता है।
वे अमेरिका में काम कर रहे भारतीयों से लौटकर भारत के तकनीकी भविष्य को बनाने में मदद करने की अपील कर रहे हैं।
उनकी यह अपील भारत की अपनी तकनीकी क्षमता विकसित करने के उनके लंबे समय के विश्वास को दिखाती है।
उनकी कहानी बताती है कि विदेश में सीखे कौशल को घर लाकर वहां काम में लगाया जा सकता है।
यह कहानी सबसे पहले इंडिया टुडे ने बताई।
कहानी बिज़नेस की
इस सफ़र से 3 सीख
- व्यवसाय शुरू करने से पहले मजबूत तकनीकी आधार बनाएं
- विदेश में काम करके असली अनुभव लें, फिर उसे घर लाएं
- अपने कौशल से भारत की समस्याओं को हल करने वाले उपकरण बनाएं