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कहानी बिज़नेस की

पूर्णिया के एक MBA पास युवा ने बांस का कारोबार खड़ा किया, जिससे 40 परिवारों को रोज़गार मिला

कोरोना महामारी में सत्यम सुंदरम की नौकरी चली गई और परिवार की सारी बचत खत्म हो गई। उन्होंने हार नहीं मानी। सरकारी योजना के कर्ज़ से उन्होंने बांस उत्पादों की कंपनी शुरू की, जो आज लगभग 40 परिवारों को सहारा दे रही है।

Illustrated scene of a young man selling bamboo baskets and lamps at a market stall in Purnia
चित्रण: News Anek (AI से बनाया गया दृश्य)

सत्यम सुंदरम बिहार के पूर्णिया ज़िले में पले-बढ़े। उनके पिता चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे।

घर में पैसों की तंगी रहती थी, फिर भी परिवार ने सत्यम की अच्छी पढ़ाई का ध्यान रखा।

MBA पूरा करने के बाद सत्यम को ITC में नौकरी मिली। फिर कोरोना महामारी आई और सब कुछ बदल गया।

उनके माता-पिता दोनों वायरस की चपेट में आकर गंभीर रूप से बीमार पड़ गए।

एक नज़र में

  • महामारी के दौरान सत्यम की ITC की नौकरी चली गई और वे पूर्णिया लौट आए।
  • उन्होंने असम और मणिपुर से 3,000 रुपये के बांस उत्पाद खरीदकर शुरुआत की।
  • PMEGP योजना के तहत 10 लाख रुपये के कर्ज़ से उनकी कंपनी शुरू हुई।
  • आज इस कारोबार से लगभग 40 परिवारों को रोज़गार मिल रहा है, जिनमें 10 कुशल कारीगर शामिल हैं।

तो शुरुआत कहां से हुई?

Early morning in a small family courtyard in Purnia, Bihar: a young man in a plain shirt stands beside a stack of freshly cut green bamboo poles, thinking about a new start
AI चित्रण

जब उनकी कंपनी ने कर्मचारियों की छंटनी की, तो सत्यम की नौकरी भी चली गई। वे माता-पिता की देखभाल के लिए घर लौट आए।

माता-पिता ठीक हो गए, लेकिन इलाज में परिवार की सारी बचत खर्च हो चुकी थी।

सत्यम ने हार नहीं मानी। एक अखबार में उन्होंने प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम के बारे में पढ़ा।

इसी से उन्हें अपना कारोबार शुरू करने का विचार आया।

सबसे मुश्किल हिस्सा कौन सा था?

Evening inside a modest room in a Bihar town: a young man sits on the floor among a few unsold bamboo baskets, a notebook of sums and a single bulb, a worried and tired mood
AI चित्रण

समाज के कुछ लोग उनका मज़ाक उड़ाते थे। वे पूछते थे कि MBA पास लड़का बांस का काम क्यों कर रहा है।

ये ताने सुनना कठिन था, और उनकी मां इन्हें गहराई से महसूस करती थीं।

उनकी मां आशा अनुरागिनी हर कदम पर उनके साथ खड़ी रहीं। उसी सहारे ने सत्यम को तब भी आगे बढ़ने की हिम्मत दी, जब दूसरे उन पर शक करते थे।

असली मोड़ कब आया?

A busy railway station platform in Bihar with a small stall displaying handmade bamboo lamps, baskets and trays, travellers stopping to look and buy
AI चित्रण

सत्यम ने असम और मणिपुर जाकर 3,000 रुपये के बांस उत्पाद खरीदे। उन्होंने इन्हें पूर्णिया के बाज़ार में बेचा, और चार दिनों के भीतर पूरा माल बिक गया।

इस छोटी सफलता से उन्हें भरोसा हो गया कि इन उत्पादों की सचमुच मांग है।

PMEGP के तहत 10 लाख रुपये के कर्ज़ से उन्होंने अपनी कंपनी 'मणिपुरी बैंबू आर्किटेक्चर' शुरू की।

अब वे कहां पहुंच चुके हैं?

A bright village workshop in Purnia where many local women and men sit together weaving bamboo baskets and lamps, piles of finished products around them, warm daylight
AI चित्रण

आज इस कारोबार से कंपनी से जुड़े लगभग 40 परिवारों को रोज़गार मिल रहा है। उनकी फैक्ट्री में 10 कुशल कारीगर काम करते हैं।

MBA पास सत्यम ने बांस से खड़ा किया कारोबार
10 लाख रुपयेPMEGP के तहत कर्ज़ से कंपनी शुरू हुई
40 परिवारकारोबार से रोज़गार पाने वाले परिवार
10 कुशल कारीगरफैक्ट्री में काम करने वाले कारीगर
3,000 रुपयेशुरुआती बांस उत्पादों की खरीद

ग्राफिक: News Anek, इसी खबर के तथ्यों से

उनके बांस उत्पाद पूर्णिया, कटिहार, दानापुर और हाजीपुर सहित कई रेलवे स्टेशनों के स्टॉल पर बिक रहे हैं।

Seemanchal at Purnia
प्रतीकात्मक फोटो: Seemanchal at Purnia। फोटो: Abhinav Walker / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

अब उनकी मां अपने बेटे की सफलता के बारे में गर्व से बात करती हैं।

जो लोग कभी उनका मज़ाक उड़ाते थे, वे अब उनकी यात्रा को सम्मान की नज़र से देख रहे हैं।

यह कहानी सबसे पहले EdexLive ने बताई।

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इस सफ़र से 3 सीख

  1. बड़ा दांव लगाने से पहले थोड़े पैसे से छोटा प्रयोग करके देखें।
  2. अपने जैसे लोगों के लिए बनी योजनाओं और स्रोतों से व्यावहारिक जानकारी लें।
  3. परिवार को साथ रखें, क्योंकि कठिन समय में उनका साथ सबसे बड़ा सहारा होता है।

स्रोत

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