सत्यम सुंदरम बिहार के पूर्णिया ज़िले में पले-बढ़े। उनके पिता चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे।
घर में पैसों की तंगी रहती थी, फिर भी परिवार ने सत्यम की अच्छी पढ़ाई का ध्यान रखा।
MBA पूरा करने के बाद सत्यम को ITC में नौकरी मिली। फिर कोरोना महामारी आई और सब कुछ बदल गया।
उनके माता-पिता दोनों वायरस की चपेट में आकर गंभीर रूप से बीमार पड़ गए।
एक नज़र में
- महामारी के दौरान सत्यम की ITC की नौकरी चली गई और वे पूर्णिया लौट आए।
- उन्होंने असम और मणिपुर से 3,000 रुपये के बांस उत्पाद खरीदकर शुरुआत की।
- PMEGP योजना के तहत 10 लाख रुपये के कर्ज़ से उनकी कंपनी शुरू हुई।
- आज इस कारोबार से लगभग 40 परिवारों को रोज़गार मिल रहा है, जिनमें 10 कुशल कारीगर शामिल हैं।
तो शुरुआत कहां से हुई?

जब उनकी कंपनी ने कर्मचारियों की छंटनी की, तो सत्यम की नौकरी भी चली गई। वे माता-पिता की देखभाल के लिए घर लौट आए।
माता-पिता ठीक हो गए, लेकिन इलाज में परिवार की सारी बचत खर्च हो चुकी थी।
सत्यम ने हार नहीं मानी। एक अखबार में उन्होंने प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम के बारे में पढ़ा।
इसी से उन्हें अपना कारोबार शुरू करने का विचार आया।
सबसे मुश्किल हिस्सा कौन सा था?

समाज के कुछ लोग उनका मज़ाक उड़ाते थे। वे पूछते थे कि MBA पास लड़का बांस का काम क्यों कर रहा है।
ये ताने सुनना कठिन था, और उनकी मां इन्हें गहराई से महसूस करती थीं।
उनकी मां आशा अनुरागिनी हर कदम पर उनके साथ खड़ी रहीं। उसी सहारे ने सत्यम को तब भी आगे बढ़ने की हिम्मत दी, जब दूसरे उन पर शक करते थे।
असली मोड़ कब आया?

सत्यम ने असम और मणिपुर जाकर 3,000 रुपये के बांस उत्पाद खरीदे। उन्होंने इन्हें पूर्णिया के बाज़ार में बेचा, और चार दिनों के भीतर पूरा माल बिक गया।
इस छोटी सफलता से उन्हें भरोसा हो गया कि इन उत्पादों की सचमुच मांग है।
PMEGP के तहत 10 लाख रुपये के कर्ज़ से उन्होंने अपनी कंपनी 'मणिपुरी बैंबू आर्किटेक्चर' शुरू की।
अब वे कहां पहुंच चुके हैं?

आज इस कारोबार से कंपनी से जुड़े लगभग 40 परिवारों को रोज़गार मिल रहा है। उनकी फैक्ट्री में 10 कुशल कारीगर काम करते हैं।
ग्राफिक: News Anek, इसी खबर के तथ्यों से
उनके बांस उत्पाद पूर्णिया, कटिहार, दानापुर और हाजीपुर सहित कई रेलवे स्टेशनों के स्टॉल पर बिक रहे हैं।

अब उनकी मां अपने बेटे की सफलता के बारे में गर्व से बात करती हैं।
जो लोग कभी उनका मज़ाक उड़ाते थे, वे अब उनकी यात्रा को सम्मान की नज़र से देख रहे हैं।
यह कहानी सबसे पहले EdexLive ने बताई।
कहानी बिज़नेस की
इस सफ़र से 3 सीख
- बड़ा दांव लगाने से पहले थोड़े पैसे से छोटा प्रयोग करके देखें।
- अपने जैसे लोगों के लिए बनी योजनाओं और स्रोतों से व्यावहारिक जानकारी लें।
- परिवार को साथ रखें, क्योंकि कठिन समय में उनका साथ सबसे बड़ा सहारा होता है।