आईडीबीआई बैंक को कनाडा के फेयरफैक्स ग्रुप को बेचे जाने के खिलाफ विरोध शुरू हो गया है। ETV Bharat की रिपोर्ट के मुताबिक बैंक कर्मचारियों की यूनियनों ने दो दिन की हड़ताल बुलाई है। सोमवार को रायपुर में LIC के मंडल कार्यालय पर बीमा कर्मियों ने लंच के बाद सभा की और नारेबाजी की। देशभर के बीमा कर्मियों ने भी भूख हड़ताल के समर्थन में प्रदर्शन किया।
एक नज़र में
- आईडीबीआई बैंक की 60.72% नियंत्रक हिस्सेदारी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग को 52878 करोड़ रुपए में बेची जा रही है।
- इसमें सरकार की 30.48% और LIC की 30.24% हिस्सेदारी शामिल है।
- कर्मचारी संगठनों ने इसे आम लोगों की बचत और देश की आर्थिक संप्रभुता के लिए खतरा बताया है।
- सौदा चालू वित्त वर्ष खत्म होने से पहले पूरा होने की उम्मीद है।
क्या है पूरा मामला
IIEA के प्रेसीडेंट धर्मराज महापात्र के अनुसार, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने 14 अक्टूबर की बैठक में बैंक की रणनीतिक बिक्री को मंजूरी दी। उनका कहना है कि मुनाफे में आ चुके बैंक को विदेशी कंपनी को बेचना देश की वित्तीय आत्मनिर्भरता के लिए नुकसानदेह है। उन्होंने यह भी कहा कि व्यापक विरोध के बावजूद सरकार सौदे को आगे बढ़ा रही है।
ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कंफेडरेशन के नेता गोपाल कृष्णन ने कहा कि वित्तीय क्षेत्र अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है और उसका विदेशीकरण राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचा सकता है। उनके मुताबिक इस कदम से आम जनता की बचत पर खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने कहा कि यह हड़ताल आईडीबीआई सहित सभी सार्वजनिक और सरकारी क्षेत्रों के निजीकरण के विरोध में है।
यूनियनों के आरोप और सवाल
रायपुर डिवीजन इंश्योरेंस एम्प्लॉइज़ यूनियन के महासचिव गजेन्द्र पटेल ने कहा कि बीमा कर्मी निजीकरण की नीतियों के खिलाफ संघर्ष जारी रखेंगे। उन्होंने याद दिलाया कि 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री ने संसद को भरोसा दिया था कि सरकार इस बैंक में कम से कम 51 प्रतिशत हिस्सेदारी रखेगी। पटेल के अनुसार मौजूदा कदम उस वादे के खिलाफ है।
कर्मचारी संगठनों ने LIC की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि LIC को बताना चाहिए कि वह बैंक में अपनी हिस्सेदारी क्यों बेच रही है, क्योंकि इस बैंक में लगा पैसा पॉलिसीधारकों का था। संगठनों के मुताबिक LIC को अपने निवेश लक्ष्यों और पॉलिसीधारकों के हितों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए।
संगठनों ने बैंक के इतिहास का भी जिक्र किया। आईडीबीआई की स्थापना 1964 में भारतीय रिजर्व बैंक की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था के रूप में हुई थी। इसका मकसद बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं को लंबे समय के लिए वित्त देना था। वर्ष 1976 में इसका स्वामित्व सरकार को सौंप दिया गया। संगठनों का आरोप है कि 1991 के बाद शुरू हुए सुधारों के नाम पर इसे वाणिज्यिक बैंक में बदल दिया गया।
बैंक ग्राहकों के लिए क्या मायने
रिपोर्ट में खाताधारकों की सेवाओं या जमा राशि पर सौदे के सीधे असर को लेकर कोई जानकारी नहीं दी गई है। प्रदर्शन करने वाले संगठनों की मुख्य चिंता आम लोगों की बचत और LIC पॉलिसीधारकों के हितों को लेकर है। सौदे के चालू वित्त वर्ष की समाप्ति से पहले पूरा होने की उम्मीद है, इसलिए आगे की प्रक्रिया पर ग्राहकों की नज़र रहेगी।