चीन ने 23 अक्टूबर को अंतरिक्ष शासन (space governance) पर अपना पोज़िशन पेपर जारी किया। इसे अंतरिक्ष के नियम तय करने की प्रक्रिया में प्रभाव बढ़ाने की कोशिश माना जा रहा है। भारत जून 2023 में ही अमेरिका के नेतृत्व वाले आर्टेमिस समझौते (Artemis Accords) पर दस्तखत कर चुका है। हिंदुस्तान टाइम्स के एक विश्लेषण के मुताबिक, भारत को अब बीजिंग के प्रस्तावों को अपनी मौजूदा प्रतिबद्धताओं के साथ तौलना होगा और आगे के लिए अपने विकल्प भी खुले रखने होंगे।
एक नज़र में
- चीन चाहता है कि अंतरिक्ष के नियम बनाने का मुख्य मंच संयुक्त राष्ट्र ही रहे।
- पेपर में निजी कंपनियों, सूचना साझा करने और हथियारों पर नियंत्रण के प्रस्ताव हैं।
- आर्टेमिस समझौता कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है और चीन के साथ सहयोग से नहीं रोकता।
- लेख के अनुसार भारत को देखना चाहिए कि साझेदारी से उसकी अपनी क्षमता कितनी बढ़ेगी।
चीन के पेपर में क्या है
अंतरिक्ष से जुड़े ज़्यादातर कानूनी ढांचे दशकों पहले लिखे गए थे। अब व्यावसायिक कंपनियां और नई तकनीकें इन नियमों की परीक्षा ले रही हैं। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने इस पेपर को बीजिंग के व्यापक गवर्नेंस एजेंडे के तहत आठ व्यावहारिक कदमों में गिनाया। यह राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ग्लोबल गवर्नेंस इनिशिएटिव का हिस्सा है। इसमें विकासशील देशों को ज़्यादा भूमिका देने का वादा है।
लेख के मुताबिक कई देश ऐसे उपग्रहों और सेवाओं पर निर्भर हैं जिनके नियम तय करने में उनकी भूमिका बहुत कम रही। उन्हें डर है कि ताकतवर सरकारें और कंपनियां आपस में ही नियम तय कर लेंगी। विकास के लिए अंतरिक्ष तकनीक के इस्तेमाल का भारत का अनुभव उसे ऐसे देशों के साथ साझा आधार देता है।
चीन ने निजी अंतरिक्ष कंपनियों को संघर्ष में गैरकानूनी दखल देने से रोकने की बात कही है। लेख का अनुमान है कि इशारा यूक्रेन में Starlink जैसी सेवाओं की ओर हो सकता है। सवाल यह भी उठता है कि दखल कब गैरकानूनी माना जाएगा, यह कौन तय करेगा और क्या चीन अपनी कंपनियों पर यही नियम मानेगा। हथियारों की होड़ रोकने के सिद्धांत पेपर में हैं, पर ठोस दायित्व और सत्यापन की व्यवस्था आगे की बातचीत पर छोड़ी गई है। चीन ने 2007 में एक उपग्रह नष्ट किया था, जिसका मलबा आज भी कक्षा में है। भारत भी एंटी-सैटेलाइट क्षमता दिखा चुका है।
आर्टेमिस समझौता और भारत के विकल्प
आर्टेमिस समझौते के तहत भारत ने नागरिक अंतरिक्ष अन्वेषण के कुछ सिद्धांतों का समर्थन किया है। इनमें यह मान्यता है कि चंद्रमा के संसाधन निकालना अपने आप में किसी इलाके पर मालिकाना हक जताना नहीं है। समझौते में अस्थायी सुरक्षा क्षेत्रों की भी बात है, जहां संचालक हानिकारक टकराव से बचने के लिए तालमेल करते हैं। इनसे ज़मीन पर स्वामित्व नहीं मिलता, लेकिन इनका आकार और इस्तेमाल बाद में आने वाले देशों के लिए मायने रखेगा।
ये राजनीतिक प्रतिबद्धताएं कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं और चीन के साथ सहयोग पर रोक नहीं लगातीं। फिर भी कहीं और विरोधाभासी सिद्धांतों का समर्थन करने की कूटनीतिक कीमत हो सकती है। लेख यह भी कहता है कि जब कोई मिशन किसी साझेदार के उपकरण और डेटा सिस्टम पर बना हो, तो साझेदार बदलने का मतलब मिशन दोबारा डिज़ाइन करना हो सकता है। तकनीकी पाबंदियां और अनुबंध भी विकल्प सीमित कर सकते हैं।
भारत के लिए क्या मायने
लेख के अनुसार उन्नत तकनीक और साझा ढांचे तक पहुंच ऐसे मिशन संभव बना सकती है जो भारत अकेले नहीं कर सकता। स्वतंत्रता के नाम पर ऐसे मौके ठुकराने से क्षमताएं और विकल्प दोनों घट सकते हैं। इसलिए बातचीत करने वालों को पूछना चाहिए कि भारतीय टीमें क्या डिज़ाइन करना, संभालना और चलाना सीखेंगी, और कौन से ज़रूरी काम विदेशी मदद पर टिके रहेंगे।