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लद्दाख की पुगा घाटी में दो जियोथर्मल कुएं शुरू, भारत में भू-तापीय ऊर्जा की पहल

ONGC एनर्जी सेंटर ने लद्दाख की पुगा घाटी में देश के पहले दो जियोथर्मल कुएं शुरू किए हैं, जिनसे 1 मेगावाट के प्रदर्शन प्रोजेक्ट की राह खुलेगी।

लद्दाख की पुगा घाटी में दो जियोथर्मल कुएं शुरू, भारत में भू-तापीय ऊर्जा की पहल
प्रतीकात्मक फोटो। फोटो: Chris Hunkeler from Carlsbad, California, USA Derivative wo / Wikimedia Commons, CC BY-SA 2.0

भारत ने भू-तापीय यानी जियोथर्मल ऊर्जा से बिजली बनाने की दिशा में पहला कदम बढ़ा दिया है। स्ट्रैट न्यूज़ ग्लोबल की रिपोर्ट के मुताबिक, ONGC एनर्जी सेंटर ने जुलाई 2026 में लद्दाख की पुगा घाटी में देश के पहले दो जियोथर्मल कुएं शुरू किए। यह घाटी 14,000 फीट से ज़्यादा की ऊंचाई पर है।

एक नज़र में

  • पुगा घाटी में दो जियोथर्मल कुएं शुरू हुए, हर कुआं 1,000 मीटर गहरा है।
  • इनसे रिज़र्वायर का आकलन होगा और प्रस्तावित 1 मेगावाट के प्रदर्शन पावर प्रोजेक्ट का रास्ता बनेगा।
  • भूवैज्ञानिक सर्वे के मुताबिक देश में करीब 10.6 GW जियोथर्मल क्षमता का सैद्धांतिक अनुमान है।
  • भारत में अभी व्यावसायिक स्तर पर जियोथर्मल बिजली उत्पादन शुरू नहीं हुआ है।

पुगा घाटी में क्या हुआ

दोनों कुएं 1,000 मीटर की गहराई तक खोदे गए हैं। इनका मकसद ज़मीन के नीचे मौजूद गर्मी के भंडार का अध्ययन करना है। इस अध्ययन के आधार पर 1 मेगावाट का प्रदर्शन प्रोजेक्ट प्रस्तावित है।

यह उपलब्धि सितंबर 2025 में अधिसूचित राष्ट्रीय जियोथर्मल ऊर्जा नीति के बाद आई है। इस नीति को लागू करने की ज़िम्मेदारी नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के पास है।

जियोथर्मल ऊर्जा क्यों अहम है

सौर और पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर रहती हैं, जबकि जियोथर्मल ऊर्जा से लगातार बिजली मिल सकती है। इसमें धरती के नीचे की गर्मी से बिजली बनाई जाती है, या हीटिंग और कूलिंग में उसका इस्तेमाल होता है।

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने 381 गर्म झरनों का नक्शा तैयार किया है और 10 जियोथर्मल प्रांतों की पहचान की है। इनमें हिमालय क्षेत्र, नागा-लुसाई, अंडमान और निकोबार, सोन-नर्मदा-ताप्ती, पश्चिमी तट, कैम्बे ग्रैबेन, अरावली, महानदी, गोदावरी और दक्षिण भारतीय क्रेटन क्षेत्र शामिल हैं। पहचाने गए संसाधनों में 42 स्थल बिजली उत्पादन और सीधे गर्मी के उपयोग के लिए संभावनाओं वाले माने गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार एन्हांस्ड और एडवांस्ड जियोथर्मल सिस्टम जैसी नई तकनीकें खोज के मौके बढ़ा सकती हैं। तकनीकी और परिचालन संभावना देखकर बेकार पड़े तेल और गैस कुओं का भी जियोथर्मल उपयोग में इस्तेमाल हो सकता है।

अन्य प्रोजेक्ट और आगे की राह

MNRE ने जुलाई और अगस्त 2025 के बीच पांच रिसर्च और डेवलपमेंट प्रोजेक्ट मंज़ूर किए। गुजरात के अंकलेश्वर में बेकार तेल-गैस कुओं को बदलकर बिजली बनाने का पायलट चल रहा है। गांधीनगर में सोलर-जियोथर्मल प्रदर्शन के तहत तीन कुओं से 70-80 डिग्री सेल्सियस का तरल निकला और 50-90 किलोवाट बिजली उत्पादन दिखाया गया। अरुणाचल प्रदेश के तवांग में पांच स्थलों पर अध्ययन हो रहा है। हैदराबाद में एयर कंडीशनिंग के लिए जियोथर्मल कूलिंग पर भी शोध जारी है।

राष्ट्रीय नीति में व्यवस्थित खोज, ड्रिलिंग, रिज़र्वायर प्रबंधन, निजी क्षेत्र की भागीदारी, ग्राउंड-सोर्स हीट पंप, राष्ट्रीय डेटा भंडार और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने पर ज़ोर है। भारत ऑस्ट्रेलिया, आइसलैंड और सऊदी अरब के साथ भी सहयोग की दिशा में काम कर रहा है।

सरकार के अनुसार 2025 के अंत तक दुनिया की स्थापित जियोथर्मल क्षमता 15.67 GW थी, जिसका करीब 67% हिस्सा इंडोनेशिया, अमेरिका, फिलीपींस, तुर्किये और न्यूज़ीलैंड के पास है। पुगा घाटी का काम भारत में इस ऊर्जा को नवीकरणीय मिश्रण का हिस्सा बनाने की शुरुआती कड़ी माना जा सकता है।


स्रोत

देशलद्दाख

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