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मनामा डायलॉग में विदेश सचिव मिस्री ने रखा भारत का पक्ष, नाविकों की सुरक्षा पर जोर

बहरीन में 22वें IISS मनामा डायलॉग में विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने समुद्री सुरक्षा पर भारत का नज़रिया रखा और नाविकों की सुरक्षा की बात कही।

मनामा डायलॉग में विदेश सचिव मिस्री ने रखा भारत का पक्ष, नाविकों की सुरक्षा पर जोर
प्रतीकात्मक फोटो। फोटो: Andrew Thomas from Shrewsbury, UK / Wikimedia Commons, CC BY-SA 2.0

विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बहरीन में हुए 22वें IISS मनामा डायलॉग रीजनल सिक्योरिटी समिट में समुद्री सुरक्षा से जुड़ी नई चुनौतियों पर भारत का पक्ष रखा। उन्होंने "Maritime Security at an Inflection Point" नाम के 5वें प्लेनरी सेशन में बात की। तीन दिन के इस सम्मेलन में दुनिया भर के मंत्री और वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल हुए।

एक नज़र में

  • मिस्री ने कहा कि समुद्री सुरक्षा सभी देशों की साझा ज़िम्मेदारी है।
  • उन्होंने व्यापारिक जहाज़ों और नाविकों की सुरक्षा तथा UNCLOS समेत अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर जोर दिया।
  • होर्मुज़ जलडमरूमध्य, लाल सागर, गल्फ ऑफ अदन और बाब-अल-मंदेब में अस्थिरता पर चिंता जताई गई।
  • भारत का संदेश है कि समुद्र सहयोग के क्षेत्र रहें, टकराव के नहीं।

सम्मेलन में क्या कहा गया

द पब्लिक वर्ल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, मिस्री ने अपने संबोधन में कहा कि टकराव के बजाय कूटनीति और सहयोग को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने व्यापारिक शिपिंग को सुरक्षित रखने, नाविकों की रक्षा करने और संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) का पालन करने की ज़रूरत बताई।

सत्र की अध्यक्षता IISS के डायरेक्टर-जनरल और चीफ एग्जीक्यूटिव डॉ. बास्टियन गीगेरिख ने की। सऊदी अरब के वाइस एडमिरल फहद बिन अब्दुल्ला अल गुफैली, सिंगापुर के रक्षा मामलों के वरिष्ठ राज्य मंत्री ज़की मोहम्मद और हिंद महासागर में फ्रांसीसी सेनाओं के संयुक्त कमांडर रियर एडमिरल यानिक बोस्सू ने भी अपनी बात रखी।

समुद्री रास्तों की अहमियत और नाविकों के लिए मायने

रिपोर्ट के अनुसार, भारत की चिंता होर्मुज़ जलडमरूमध्य, लाल सागर, गल्फ ऑफ अदन और बाब-अल-मंदेब जैसे अहम जलमार्गों में रुकावटों को लेकर है। इन रास्तों में अस्थिरता से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे माल ढुलाई और बीमा का खर्च बढ़ सकता है और विकासशील देशों पर आर्थिक दबाव भी पड़ सकता है।

समुद्री सुरक्षा का मतलब सिर्फ जहाज़ों और रास्तों की रक्षा नहीं है। इसमें समुद्री डकैती, व्यापारिक जहाज़ों पर हमले, तस्करी और दूसरे सीमा-पार खतरों से निपटना भी शामिल है। इसके लिए समुद्री क्षेत्र की जानकारी (maritime domain awareness), सूचना साझा करने, निगरानी और देशों के बीच तालमेल को मज़बूत करने की बात कही गई। नाविकों के लिए यह इसलिए अहम है कि इन्हीं रास्तों पर उनका काम और सुरक्षा निर्भर करती है।

भारत का नज़रिया

लंबी तटरेखा और व्यापार तथा ऊर्जा सुरक्षा के लिए हिंद महासागर पर निर्भरता के कारण भारत के लिए सुरक्षित और खुले समुद्री रास्ते आर्थिक विकास और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए ज़रूरी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत लगातार ऐसे समावेशी तरीके की वकालत करता रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग, अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर आधारित हो।

मनामा डायलॉग में शामिल देशों को समुद्री खतरों पर विचार साझा करने और नौवहन की स्वतंत्रता, नाविकों की सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट की सुरक्षा के साझा उपायों पर चर्चा का मौका मिला।


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