सोचिए, सालों तक किसी ईंट-भट्ठे पर बिना मज़दूरी जबरन काम करने के बाद आपको छुड़ाया गया, और फिर कानून ने जो मदद देने का वादा किया था, उसके लिए महीनों, कभी-कभी सालों तक इंतज़ार करना पड़ा। देश के कई मुक्त बंधुआ मज़दूरों की यही कहानी रही है। 2 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह बंद होना चाहिए।
एक नज़र में
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छुड़ाए गए बंधुआ मज़दूरों को तुरंत मिलने वाली आर्थिक मदद आम तौर पर 7 दिन के भीतर मिले।
- बंधुआ मज़दूरी की शिकायत की जांच 24 घंटे में होनी चाहिए।
- केंद्र और सभी राज्यों को 6 महीने में एक तय प्रक्रिया लागू करनी होगी।
- पुनर्वास योजना में मामले के हिसाब से ₹1 लाख से ₹3 लाख तक मिलते हैं।
सुरेंद्र मांझी व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य मामले में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की बेंच ने यह फैसला दिया। कोर्ट ने एक लाइन में बात साफ कर दी: पुनर्वास में देरी, असल में पुनर्वास से इनकार के बराबर हो सकती है।
बंधुआ मज़दूरी क्या है?
यह आधुनिक गुलामी का एक रूप है। कोई गरीब मज़दूर, अक्सर दलित या आदिवासी परिवार से, छोटा कर्ज़ या एडवांस लेता है। फिर मालिक उससे, कई बार पूरे परिवार से, ऐसा कर्ज़ "चुकाने" के लिए काम करवाता है जो कभी खत्म ही नहीं होता। मज़दूर को छोड़कर जाने नहीं दिया जाता और मज़दूरी बहुत कम या बिल्कुल नहीं मिलती। भारत ने 1976 में कानून बनाकर इसे खत्म किया, फिर भी ईंट-भट्ठों, खेतों और पत्थर खदानों में यह जारी है, अक्सर दूसरे राज्यों से लाए गए प्रवासी मज़दूरों के साथ।
कोर्ट ने क्या आदेश दिया
- 7 दिन में पैसा: छुड़ाए जाने पर ज़िला प्रशासन "रिलीज़ सर्टिफिकेट" देता है। उसके 7 दिन के भीतर तुरंत मिलने वाली आर्थिक मदद दी जाए।
- 24 घंटे में जांच: शिकायत की जांच आम तौर पर 24 घंटे में हो, और सही पाए जाने पर तुरंत छुड़ाया जाए।
- पूरे देश के लिए नियम: केंद्र 6 महीने में अपनी मानक प्रक्रिया (SOP) लागू करे, और सभी राज्य व केंद्रशासित प्रदेश 6 महीने में पालन करें।
- योजना में बदलाव: तुरंत मिलने वाली मदद बढ़ाने और देरी होने पर "अंतरिम गुज़ारा भत्ता" देने के प्रस्ताव पर केंद्र 3 महीने में फैसला करे।
इस मामले के याचिकाकर्ता मज़दूरों को एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाया गया था, जो आम पैटर्न है, और इसी वजह से वे दो सरकारों के बीच फंस गए थे। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और बिहार को एक महीने में मिलकर उनका बकाया तय करने और ज़्यादा से ज़्यादा 6 महीने में भुगतान करने को कहा है।
देरी इतनी भारी क्यों पड़ती है
छुड़ाए गए मज़दूर के पास आम तौर पर कुछ नहीं होता: न बचत, न काम, अक्सर लौटने को घर भी नहीं। जल्दी पैसा न मिले तो कई लोग किसी नए साहूकार के कर्ज़ में फंस जाते हैं और गुलामी का चक्र फिर शुरू हो जाता है। बिना पुनर्वास के छुटकारा असली आज़ादी नहीं है।
अब आगे क्या
अब 7 दिन, 1 महीना और 6 महीने की समय-सीमाएं हैं, जिनका हवाला मज़दूर, वकील और कार्यकर्ता अफसरों की देरी पर दे सकते हैं। भुगतान न मिलने पर परिवार ज़िलाधिकारी (DM), राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से संपर्क कर सकते हैं। अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिससे कर्ज़ के बदले जबरन काम करवाया जा रहा है, तो ज़िलाधिकारी या पुलिस को बताएं।
सवाल-जवाब
फैसला किस बेंच ने दिया?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की बेंच ने, सुरेंद्र मांझी व अन्य बनाम भारत संघ मामले में।