गुजरात सरकार ने अपने शहरों को और हरा-भरा बनाने के लिए नई नीति को मंज़ूरी दी है। इसका नाम गुजरात अर्बन ग्रीनिंग पॉलिसी, 2026 है।
इस नीति के तहत राज्य के शहरों को अगले 10 साल में अपना हरित क्षेत्र कम से कम 20% बढ़ाना होगा।
यह जानकारी इंडियन मास्टरमाइंड्स की रिपोर्ट में दी गई है।
इस नीति में गुजरात के सभी 169 शहरी स्थानीय निकाय (ULB) शामिल हैं। इनमें 17 नगर निगम और 152 नगरपालिकाएं हैं।
ग्राफिक: News Anek, इसी खबर के तथ्यों से
एक नज़र में
- शहरों को 10 साल में कम से कम 20% हरित क्षेत्र जोड़ना होगा।
- नीति में गुजरात के 169 शहरी स्थानीय निकाय शामिल हैं।
- फंडिंग इस पर निर्भर करेगी कि शहर कितनी अच्छी तरह पौधे लगाते और संभालते हैं।
- इस नीति की समीक्षा हर दो साल में होगी।
तो यह नीति पुराने पौधारोपण अभियानों से कैसे अलग है?
यह नीति सिर्फ बड़े पेड़ लगाने के अभियानों तक सीमित नहीं है। सरकार चाहती है कि हरित ढांचा शहरों की योजना का नियमित हिस्सा बने।
इसका ध्यान बढ़ते तापमान, प्रदूषण और स्टॉर्मवॉटर प्रबंधन पर है। नीति का मकसद शहरों की कई तरह की जगहों पर हरियाली बढ़ाना है।
नगर निगमों के पार्क और बगीचा विभागों में शहरी ग्रीनिंग सेल बनाए जाएंगे। शहरी विकास प्राधिकरण और क्षेत्र विकास प्राधिकरण में भी ऐसे सेल होंगे।
शहरों का आकलन कैसे होगा और इनाम कैसे मिलेगा?
नीति में हर साल ग्रीन स्टार रेटिंग व्यवस्था लाई जाएगी।
शहरों का आकलन पौधारोपण, पौधों के बचने, हरित स्थानों की पहुंच और पर्यावरण पर असर के आधार पर होगा।
स्कोर के आधार पर शहरों को तीन श्रेणियों में रखा जाएगा। सबसे अच्छा शहर हर साल "अल्टीमेट ग्रीन सिटी ऑफ गुजरात" का खिताब पाएगा।
अच्छा प्रदर्शन करने वाले शहरों को अतिरिक्त राज्य फंडिंग और अनुदान में प्राथमिकता मिल सकती है।
जो शहर लगातार दो साल 50% से कम स्कोर करेंगे, वे सुधार ट्रैक पर डाले जाएंगे।
क्या पौधे सच में बचेंगे? आगे क्या होगा?
नीति में लगाए गए पौधों के लिए कम से कम 80% बचाव का लक्ष्य रखा गया है।
पौधारोपण परियोजनाओं का भुगतान कम से कम पांच साल तक सत्यापित बचाव पर निर्भर करेगा।
गुजरात अर्बन डेवलपमेंट मिशन तकनीकी नोडल एजेंसी के रूप में काम करेगा। राज्य स्तरीय निगरानी समिति प्रगति और खर्च की निगरानी करेगी।
पहले साल समिति हर तिमाही बैठक करेगी, उसके बाद साल में दो बार। यह नीति नवंबर 2026 से एक दशक तक लागू रहेगी।
गुजरात की लगभग 48% आबादी शहरी इलाकों में रहती है। सरकार का कहना है कि इससे शहर रहने लायक बनेंगे और शहरीकरण का दबाव कम होगा।